अपनी ही जमीन पाने के लिए दर दर की ठोकरें खा रहे आदिवासी किसान,लगाई कलेक्टर से गुहार, राजस्व निरीक्षक राठौर पर लगाया रिश्वत लेने का आरोप, कहा नहीं दे पाए तो कर दिया ऐसा काम….



पत्थलगांव। वन अधिकार पट्टे में शासन द्वारा प्रदत्त भूमि को प्राप्त करने के लिए हितग्राहियों को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं। हितग्राहियों ने राजस्व निरीक्षक के खिलाफ कलेक्टर और एसडीएम से शिकायत कर मामले की निष्पक्ष जांच कराकर भूमि उन्हें दिलाने तथा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है।
वनभूमि का पट्टा जानकारी के अनुसार ग्राम करमीटिकरा निवासी रतन राम,संतराम,अमरसाय व देवसाय को शासन की ओर से वन अधिकार पट्टा प्रदान किया गया है। इसके आधार पर संबंधितों द्वारा कलेक्टर के न्यायालय में राजस्व अभिलेख में रिकाॅर्ड दुरूस्त कराने के लिए आवेदन किया गया था। कलेक्टर द्वारा मौका जांच कर अभिलेख दुरूस्त कराने के लिए आवेदन किया गया था। उपरोक्त आवेदन के आधार पर कलेक्टर द्वारा तहसीलदार को मौका जांच कर आगे की कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए। जिसके बाद तहसीलदार द्वारा राजस्व निरीक्षक को मौके पर भेजा गया परंतु राजस्व निरीक्षक के द्वारा भूमि को किसी और की बता दिया गया। इससे परेशान ग्रामीणों ने कलेक्टर और पत्थलगांव के एसडीएम आर एस लाल से मामले की शिकायत की है। शिकायत में उन्होंने राजस्व निरीक्षक ताराचंद राठौर पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि मौका जांच के उपरांत श्री राठौर द्वारा पंचनामा तैयार किया गया और इसमें उनसे हस्ताक्षर करा लेने के बाद कुछ पंक्तियां जोड़ दी गईं जिसमें उक्त भूमि में 2013-14 से पूर्व उनका कब्जा नहीं होने की बात लिख दी गई है। जबकि हस्ताक्षर कराते समय यह बातें लिखी हुई नहीं थीं। इसे लेकर उन्होंने संबंधित राजस्व निरीक्षक पर विरोधी पक्ष के साथ मिलीभगत का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि कब्जा नहीं होने की बात लिखा जाना अपने आप में ही इस संदेह को पुष्ट करने के लिए काफी है। वहीं उन्होंने राजस्व निरीक्षक पर 4हजार रू की रिश्वत लेने का भी आरोप लगाया है। उनका कहना है कि निरीक्षक द्वारा 10 हजार रू की रकम उनसे मांगी गई थी परंतु गरीब होने के कारण वे पूरी रकम नहीं दे सके। ग्रामीणों ने संदेह जताया है कि मांग पूरी नहीं होने के कारण ही निरीक्षक द्वारा उनके काम में जानबूझकर गड़बड़ी की जा रही है। ग्रामीणों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है।
पट्टा मिलने के बाद लगी नजर
शिकायतकर्ता रतनराम ने बताया कि पट्टा में प्राप्त भूमि वनभूमि थी। उनके पूर्वजों ने इस पर लगे वृक्षों को काटकर इस भूमि को खेत के रूप में तैयार किया और इस पर खेती करने लगे। उनका कहना है कि तब के समय आज की भांति कटाई अथवा खुदाई और जुताई के लिए आधुनिक यंत्र उपलब्ध नहीं थे और उनके पूर्वजों ने अपना पसीना बहाकर इसे खेत का स्वरूप दिया। इस हकीकत से पूरे गांव के लोग वाकिफ हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में उनकी आयु 63 वर्ष है और वे स्वयं करीब 40 से 50 वर्षों से अपने पिता और परिजनों के साथ मिलकर इस भूमि पर खेती करते आ रहे हैं परंतु इसे लेकर कभी कोई भी विवाद उत्पन्न नहीं हुआ। परंतु सरकार से पट्टा मिल जाने के बाद इस पर लोगों की नजर लग गई। उनका कहना है कि वे हरसंभव संघर्ष करने को तत्पर हैं परंतु अपने पूर्वजों के खून-पसीने से सिंचित इस भूमि पर अपना अधिकार कभी नहीं छोड़ेंगे।
पट्टा अपने आप में ही है प्रमाण
शिकायतकर्ता रतनराम,संतराम तथा अन्य का कहना है कि वनअधिकार पट्टा इस भूमि पर उनके कब्जे का अपने आप में ही प्रमाण है। उन्होंने बताया कि शासन की योजना के अनुसार किसी भी व्यक्ति को पट्टा तभी प्राप्त हो सकता है जब उसका भूमि पर लंबे समय तक कब्जा रहा हो। यह पट्टे की सबसे पहली शर्त है। उनके मामले में भी इस शर्त को पूरा करने के बाद ही वन अधिकार पट्टा प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी और प्रक्रिया पूरी करने के बाद शासन से पट्टा प्रदान किया गया। उधर वन विभाग भी पट्टा प्राप्त करने के लिए संबंधित भूमि पर आवेदक का कब्जा होने की शर्त की पुष्टि करता है। विभाग का कहना है कि कम से कम 20 वर्ष तक कब्जे की पुष्टि होने के बाद ही व्यक्ति पट्टा प्राप्त करने के लिए पात्र हो सकता है इससे पहले नहीं। परंतु पट्टा हासिल करने के लिए उसे अन्य शर्तों को भी पूरा करना आवश्यक है।