अंधेर नगरी, चौपट कार्रवाई! तमता छात्रावास में कथित गड़बड़ियों पर बवाल, अधीक्षक पर कार्रवाई क्यों नहीं? बच्चों के हक से जुड़े गंभीर आरोपों के बीच विभाग की चुप्पी पर सवाल—सहायक आयुक्त की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में, ग्रामीणों की दोटूक चेतावनी: जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो सड़कों पर उतरेगी जनता

 

मुकेश अग्रवाल

पत्थलगांव/तमता। आदिवासी बच्चों के भविष्य और सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही से जुड़ा तमता बालक छात्रावास मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। छात्रावास अधीक्षक बुधनाथ भगत के खिलाफ भ्रष्टाचार, कथित फर्जी नियुक्तियों और बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं में गड़बड़ी के गंभीर आरोप सामने आने के बावजूद ठोस कार्रवाई नहीं होने से स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। अब सवाल सिर्फ अधीक्षक की भूमिका का नहीं, बल्कि उन जिम्मेदार अधिकारियों का भी है, जिनके कंधों पर विभागीय निगरानी और कार्रवाई की जिम्मेदारी है।

आरोप गंभीर, सवाल तीखे—फिर कार्रवाई की रफ्तार इतनी धीमी क्यों?

तमता क्षेत्र में उठ रही आवाज अब सीधे प्रशासन से जवाब मांग रही है। स्थानीय नागरिकों का सवाल है कि जब छात्रावास की व्यवस्थाओं और बच्चों को मिलने वाली सामग्री को लेकर शिकायतें सामने आ रही हैं, तो जांच की स्थिति और कार्रवाई का विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा है?

कंबल, मच्छरदानी और थाली-बर्तन जैसी जरूरी सामग्री को लेकर उठे सवालों ने मामले को और गंभीर बना दिया है। यदि बच्चों के लिए उपलब्ध कराई गई सुविधाओं में वास्तव में अनियमितताएं हुई हैं, तो उनका जिम्मेदार कौन है? क्या संबंधित अभिलेखों की जांच की गई? शिकायतों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई? इन सवालों का जवाब विभाग को देना चाहिए।

सहायक आयुक्त की कार्यशैली पर सवाल—आखिर जवाबदेही कब?

आदिम जाति कल्याण विभाग के सहायक आयुक्त की कार्यशैली को लेकर भी स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं। लोगों की मांग है कि विभाग स्पष्ट करे कि अधीक्षक के खिलाफ प्राप्त शिकायतों पर क्या जांच हुई और अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई दे रही है।

जनता का सवाल है—क्या गंभीर शिकायतों का निपटारा केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित रहेगा, या जांच के निष्कर्षों के आधार पर जिम्मेदारी भी तय होगी?

यदि शिकायतों में दम है, तो दोषियों पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, किसी अधिकारी को बिना जांच दोषी ठहराना भी उचित नहीं है। इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और उसके परिणामों को सार्वजनिक करना जरूरी है।

बच्चों के हक पर सवाल, विभाग से जवाब का इंतजार!

छात्रावास में रहने वाले आदिवासी बच्चे बेहतर शिक्षा, सुरक्षित वातावरण और जरूरी सुविधाओं के हकदार हैं। उनके लिए स्वीकृत सामग्री और सरकारी संसाधनों के उपयोग में कथित गड़बड़ी की शिकायतों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

स्थानीय लोगों की मांग है कि छात्रावास के स्टॉक रजिस्टर, सामग्री वितरण के रिकॉर्ड, नियुक्तियों से संबंधित दस्तावेजों और वित्तीय अभिलेखों की जांच कराई जाए। यदि किसी स्तर पर अनियमितता या लापरवाही प्रमाणित होती है, तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार विभागीय कार्रवाई की जाए। आपराधिक कृत्य के साक्ष्य मिलने पर कानूनी कदम भी उठाए जाएं।

जांच के नाम पर लीपापोती हुई तो बढ़ेगा आक्रोश!

तमता क्षेत्र में इस मामले को लेकर नाराजगी बढ़ने की बात सामने आ रही है। स्थानीय नागरिकों और विभिन्न संगठनों का कहना है कि शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई नहीं हुई, तो वे आंदोलन का रास्ता अपना सकते हैं।

ग्रामीणों की मांग है कि अधीक्षक के खिलाफ लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच हो और जांच पूरी होने तक मामले को ठंडे बस्ते में न डाला जाए। उनका कहना है कि केवल पद से हटाने या औपचारिक नोटिस जारी करने से सवाल खत्म नहीं होंगे; जरूरी है कि जांच में जिम्मेदारी स्पष्ट हो और दोष सिद्ध होने पर उचित कार्रवाई की जाए।

ग्रामीणों की दोटूक चेतावनी है कि यदि जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो तमता में विरोध-प्रदर्शन और उग्र आंदोलन किया जाएगा।

अब प्रशासन की परीक्षा—कार्रवाई होगी या आंदोलन का इंतजार?

तमता छात्रावास मामले ने विभागीय निगरानी और जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि जिला प्रशासन और आदिम जाति कल्याण विभाग शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए जांच की स्थिति स्पष्ट करेंगे।

जनता का सवाल साफ है—बच्चों के हक से जुड़े मामले में जवाबदेही तय होगी या मामला फाइलों में ही उलझा रहेगा?

अब निगाहें जिला प्रशासन और विभाग के अगले कदम पर टिकी हैं। तमता के लोगों को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, पारदर्शी कार्रवाई और बच्चों की सुविधाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले ठोस परिणाम चाहिए।

तमता की हुंकार: बच्चों के हक पर समझौता नहीं—जांच कराओ, जिम्मेदारी तय करो और दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई करो!

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