कागजों में निगरानी, जमीन पर लापरवाही? 11 बच्चों के बाहर निकलने से हॉस्टल व्यवस्था कठघरे में हॉस्टल कांड पर सियासत गरम—रामपुकार सिंह की चेतावनी, ‘कार्रवाई नहीं तो आंदोलन’

 

मुकेश अग्रवाल

पत्थलगांव/जशपुर।

पत्थलगांव के शासकीय प्री-मैट्रिक आदिवासी बालक छात्रावास से आधी रात 11 बच्चों के बाहर निकलने और न्यू लक्ष्मी मोबाइल दुकान में चोरी की घटना ने छात्रावास की निगरानी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिन बच्चों की जिम्मेदारी छात्रावास में पढ़ाई, अनुशासन और सुरक्षित माहौल में रहने की थी, वे आखिर रात के अंधेरे में छात्रावास से बाहर कैसे निकले और मोबाइल दुकान तक कैसे पहुंच गए—यह सवाल अब पूरे मामले के केंद्र में है।

घटना सामने आने के बाद प्रशासनिक अमला सक्रिय हुआ। जशपुर जिले के आयुक्त संजय सिंह ने शुक्रवार को छात्रावास का निरीक्षण भी किया। लेकिन निरीक्षण के बाद लोगों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि निरीक्षण की फाइल आगे बढ़ेगी या फिर मामला भी निरीक्षण की ‘रस्म’ निभाकर फाइलों में आराम फरमाएगा।

रात में छात्रावास से ‘आउट’, फिर चोरी के ‘रूट’ पर!

मामले की सबसे गंभीर कड़ी यह है कि छात्रावास में रहने वाले 11 बच्चे आधी रात बाहर निकले और बाद में मोबाइल दुकान में चोरी की घटना से उनका नाम जुड़ा। सवाल यह है कि छात्रावास की निगरानी व्यवस्था उस रात कहां थी?

क्या गेट सो रहा था? क्या निगरानी सो रही थी? या फिर जिम्मेदारी की चौकी पर ही ताला लगा था?

बच्चों का इस तरह छात्रावास से बाहर निकल जाना केवल चोरी की घटना का मामला नहीं, बल्कि छात्रावास की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

निरीक्षण हुआ… अब कार्रवाई भी होगी या सिर्फ निरीक्षण की फोटो?

घटना के बाद आयुक्त संजय सिंह के निरीक्षण से उम्मीद जगी कि जिम्मेदारी तय होगी और लापरवाही पर कार्रवाई होगी। लेकिन स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर निरीक्षण का परिणाम क्या निकला?

पत्रकारों द्वारा कार्रवाई को लेकर सवाल पूछे जाने पर, उपलब्ध जानकारी के अनुसार, स्पष्ट कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई। इससे लोगों में यह चर्चा तेज है कि क्या जांच का पहिया चलेगा या फिर सरकारी दफ्तरों की फाइलों की तरह धीरे-धीरे धूल खाएगा?

हालांकि प्रशासन की ओर से अंतिम कार्रवाई या जिम्मेदारी तय किए जाने संबंधी आधिकारिक निर्णय सामने आना बाकी है।

अधीक्षक और मंडल संयोजक की भूमिका पर सवाल

इस पूरे घटनाक्रम में छात्रावास अधीक्षक सूर्यकांत निकेतकारी और मंडल संयोजक मनीष पैकरा की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों और अभिभावकों का कहना है कि छात्रावास से एक साथ 11 बच्चों का रात में बाहर निकल जाना सामान्य घटना नहीं मानी जा सकती।

लोगों का आरोप है कि यदि निगरानी व्यवस्था प्रभावी होती तो बच्चों के इस तरह बाहर निकलने की जानकारी समय रहते मिल जानी चाहिए थी। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष भी इस मामले में महत्वपूर्ण होगा।

पूर्व मंत्री रामपुकार सिंह ने बढ़ाया दबाव

मामले ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है। पूर्व विधायक एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री रामपुकार सिंह ने कार्रवाई की मांग करते हुए चेतावनी दी है कि यदि जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

अभिभावकों का सवाल—बच्चे हॉस्टल में पढ़ने गए थे या रात में घूमने?

घटना के बाद अभिभावकों में भी नाराजगी है। अभिभावकों का कहना है कि वे अपने बच्चों को छात्रावास में इसलिए भेजते हैं कि उन्हें सुरक्षित वातावरण और पढ़ाई का माहौल मिले। ऐसे में यदि बच्चे आधी रात छात्रावास से निकलकर चोरी की घटना में शामिल पाए जाते हैं तो इसकी जिम्मेदारी और निगरानी व्यवस्था की जांच होना जरूरी है।

यह मामला केवल चोरी तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि आखिर वे 11 बच्चे छात्रावास से निकले कैसे? किसकी नजर से बचकर निकले? और इतनी बड़ी घटना होने तक निगरानी तंत्र को भनक क्यों नहीं लगी?

अब असली परीक्षा प्रशासन की

फिलहाल निरीक्षण हो चुका है, सवाल उठ चुके हैं और राजनीतिक चेतावनी भी सामने आ चुकी है। अब गेंद प्रशासन के पाले में है।

क्या जिम्मेदारी तय होगी?

क्या छात्रावास की निगरानी व्यवस्था की जांच होगी?

क्या अधीक्षक और मंडल स्तर की भूमिका की निष्पक्ष जांच होगी?

या फिर जांच के नाम पर कागज दौड़ेंगे और मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला जाएगा?

पत्थलगांव के अभिभावक और स्थानीय लोग अब निरीक्षण नहीं, परिणाम और जवाबदेही देखना चाहते हैं।

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