रायगढ़ में अब कानून बोलता नहीं… सीधे कार्रवाई करता है : रायगढ़ सिंघम शशिमोहन सिंह

मुकेश अग्रवाल
रायगढ़ की हवा इन दिनों कुछ बदली-बदली सी है। चौक-चौराहों पर चाय की दुकानों में अब मौसम से ज्यादा चर्चा “ऑपरेशन आघात”, “प्रहार” और “अंकुश” की होती है। जिन गलियों में कभी सट्टे की फुसफुसाहट और कबाड़ियों की खटर-पटर सुनाई देती थी, वहां अब अपराधियों के मोबाइल में एक ही नाम सेव है—

“सावधान… एसएसपी ऑन ड्यूटी!”
रायगढ़ में कानून का सिंहनाद — अपराधियों के लिए काल, जनता के लिए ढाल बने एसएसपी शशिमोहन सिंह
रायगढ़ में इन दिनों अपराधियों की हालत वैसी हो गई है जैसे परीक्षा हॉल में नकलची छात्र की अचानक उड़नदस्ता देखकर हो जाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां उड़नदस्ता नहीं, खुद एसएसपी शशिमोहन सिंह की रणनीति मैदान में उतर चुकी है।
कभी जो अपराधी रसूख और सिफारिश की ऑक्सीजन पर खुलेआम घूमते थे, वे अब पुलिस की गाड़ियों की आवाज सुनते ही ऐसे गायब हो रहे हैं जैसे बिजली जाते ही मोहल्ले का वाई-फाई। जिले में सट्टा, जुआ, कबाड़, साइबर ठगी, लूट, हत्या और अपहरण के धंधेबाजों पर जिस तेजी से शिकंजा कसा गया है, उसने अपराध जगत के पुराने खिलाड़ियों की नींद और नए खिलाड़ियों के सपने—दोनों उड़ा दिए हैं।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह पूरी पुलिसिंग बिना किसी “फिल्मी एंट्री” के हो रही है। न सोशल मीडिया पर अनावश्यक चमक, न हर घंटे प्रेस नोट का शोर। यहां काम पहले होता है, खबर बाद में बनती है। रायगढ़ की जनता कह रही है कि “साहब कैमरे में कम और कार्रवाई में ज्यादा दिखते हैं।”
एसएसपी शशिमोहन सिंह की कार्यशैली ने यह साफ कर दिया है कि कानून अब सिर्फ किताबों में छपा अध्याय नहीं, बल्कि सड़क पर चलता हुआ सिस्टम है। जिले के अपराधियों को शायद पहली बार एहसास हुआ है कि “ऊपर तक पहुंच” वाला पुराना फार्मूला अब उतना असरदार नहीं रहा।
“ऑपरेशन आघात”, “अंकुश” और “प्रहार” ने अपराधियों के नेटवर्क में ऐसी भगदड़ मचाई है कि कई शातिर अब खुद को “सामाजिक कार्यकर्ता” साबित करने में लगे हैं। थाना स्तर पर बढ़ी जवाबदेही और फील्ड में लगातार निगरानी ने पुलिस विभाग में भी नई ऊर्जा भर दी है। जवानों की सक्रियता देखकर ऐसा लग रहा है मानो विभाग ने अचानक “टर्बो मोड” ऑन कर दिया हो।
रायगढ़ के व्यापारी अब दुकान बंद करते वक्त उतने चिंतित नहीं दिखते, महिलाएं ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रही हैं और आम नागरिकों के चेहरे पर यह भरोसा लौट रहा है कि “पुलिस फोन उठाने के लिए नहीं, कार्रवाई करने के लिए भी होती है।”
लेकिन कहानी सिर्फ सख्ती तक सीमित नहीं है। एसएसपी शशिमोहन सिंह ने “सोशल पुलिसिंग” को भी नया रंग दिया है। खेल प्रतियोगिताओं, जागरूकता अभियानों और सामाजिक आयोजनों में उनकी भागीदारी ने पुलिस और जनता के बीच की पुरानी दूरी को कम किया है। जनता को अब वर्दी में सिर्फ डर नहीं, भरोसा भी दिख रहा है।
रायगढ़ में आज हालात ऐसे हैं कि अपराधियों के बीच पुलिस का नहीं, सीधे “एसएसपी का खौफ” चर्चा में है। वहीं शरीफ नागरिकों के बीच पुलिस के लिए सम्मान और विश्वास लौटता दिखाई दे रहा है।
कुल मिलाकर रायगढ़ में इस समय कानून की आवाज धीमी जरूर है, लेकिन उसकी गूंज इतनी तेज है कि अपराधियों के कानों तक साफ सुनाई दे रही है—
“अब रायगढ़ में खेल पुराना नहीं चलेगा… क्योंकि मैदान में शशिमोहन सिंह उतर चुके हैं।”



