छत्तीसगढ़ का महापर्व छेरछेरा धूमधाम से संपन्न
छेरछेरा माई कोठी के धान ला हेर हेरा….

मुकेश अग्रवाल
पत्थलगांव: पत्थलगांव में छेरछेरा पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जा रहा है. सुबह से ही छोटे छोटे बालक बालिकाओं में बहुत ही उत्साह देखा जा रहा है इस पर्व की सबसे खास बात यह है कि इसमें धन की जगह धान का दान होता है छेरछेरा पर्व पौष पूर्णिमा के दिन जैजैपुर क्षेत्र में बड़े ही धूमधाम और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है. इस साल 2024 में छेरछेरा पर्व यानी आज 25 जनवरी को मनाया जा रहा है. इसे छेरछेरा पुन्नी या छेरछेरा तिहार भी कहते हैं.इसे दान लेने-देने का पर्व माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि इस दिन दान करने से घरों में धन धान्य की कोई कमी नहीं होती इस दिन छत्तीसगढ़ में बच्चे और बड़े, सभी घर-घर जाकर अन्न का दान ग्रहण करते देखा जा रहा हैं.छेरछेरा त्यौहार तब मनाया जाता है, जब किसान अपने खेतों से फसल काटकर एवं उसकी मिसाई कर अन्न (नया चावल) को अपने घरों में भंडारण कर चुके होते है. यह पर्व दान देने का पर्व है. किसान अपने खेतों में साल भर मेहनत करने के बाद अपनी मेहनत की कमाई धन को दान देकर छेरछेरा त्यौहार मनाते हैं. माना जाता है कि दान देना महा पुण्य का कार्य होता है. किसान इसी मान्यता के साथ अपने मेहनत से उपजाई हुई धान का दान देकर महान पुण्य का भागीदारी निभाने हेतु छेरछेरा त्यौहार मनाते हैं. इस दिन बच्चे अपने गांव के सभी घरों में जाकर छेरछेरा कह कर अन्न का दान मांगते और सभी घरों में अपने कोठी अर्थात अन्न भंडार से निकालकर सभी को अन्नदान करते हैं. गांव के बच्चे टोली बनाकर घर-घर छेरछेरा मांगने जाते हुए देखा जा रहा हैं.
छेरछेरा माई कोठी के धान ला हेर हेरा
इस पर्व को मानते हुए बच्चों और बड़े बुजुर्गों की टोलियां एक अनोखे बोल, बोल कर दान मांगते है. दान लेते समय बच्चे ‘छेर छेरा माई कोठी के धान ला हेर हेरा’ कहते हैं और जब तक घर की महिलायें अन्न दान नहीं देंगी तब तक वे कहते रहेंगे ‘अरन बरन कोदो दरन, जब्भे देबे तब्भे टरन’. इसका मतलब ये होता है कि बच्चे कह रहे हैं, मां दान दो, जब तक दान नहीं दोगे तब तक हम नहीं जाएंगे.


