दीपावली पर पत्थलगांव को मिला गड्ढों और धूल का ‘शाही उपहार’! मुख्यमंत्री के गृह जिले के प्रमुख व्यापारिक नगर में सड़कें बदहाल, बाजार धूल के गुबार में गुम; प्रकाश स्कूल के पास NH-43 बनी मुसीबत, जशपुर रोड और नंदन झरिया मार्ग पर गड्ढों का साम्राज्य, 10 साल बाद भी बाईपास का सपना अधूरा

मुकेश कुमार
पत्थलगांव। दीपावली पर किसी शहर को रोशनी, साफ-सफाई और सुंदर सड़कों का उपहार मिलता है, लेकिन पत्थलगांव की किस्मत देखिए! यहां के नागरिकों को गड्ढों, उड़ती धूल और बदहाल यातायात का ऐसा तोहफा मिला है, जिसे देखकर लगता है कि शहर के विकास में डामर कम और धूल ज्यादा खर्च की गई है। घरों में रंग-रोगन हो गया, दुकानों में झालरें जगमगा उठीं, बाजार सज गए, लेकिन शहर की सड़कों की तस्वीर बदलने की फुर्सत जिम्मेदार विभागों को शायद अब तक नहीं मिली।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के गृह जिले जशपुर के प्रमुख व्यापारिक नगर पत्थलगांव में दीपावली की रौनक के बीच सड़कों की बदहाली ने विकास के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। नगर में प्रवेश करते ही ऐसा एहसास होता है मानो सड़क पर नहीं, किसी निर्माणाधीन खदान के बीच से गुजर रहे हों। कहीं बड़े-बड़े गड्ढे, कहीं उखड़ा डामर, कहीं बिखरी गिट्टियां तो कहीं वाहनों के गुजरते ही उठता धूल का गुबार। कुल मिलाकर शहरवासियों को सड़क कम और मुसीबत ज्यादा नसीब हो रही है।
NH-43 : नाम नेशनल हाईवे, लेकिन गड्ढों ने बना दिया स्थानीय मुसीबत मार्ग!
पत्थलगांव से गुजरने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग-43 शहर की प्रमुख जीवनरेखा है, लेकिन इसकी मौजूदा हालत देखकर नेशनल हाईवे शब्द भी शर्मिंदा होता नजर आता है। प्रकाश स्कूल के पास सड़क की स्थिति इतनी खराब बताई जा रही है कि दोपहिया और चारपहिया वाहनों को वहां से गुजरने में भारी परेशानी उठानी पड़ रही है। बड़े-बड़े गड्ढे वाहन चालकों के लिए रोज नई चुनौती बन रहे हैं। दिन में किसी तरह गड्ढे बचाकर वाहन निकाल लिया जाए तो रात में यह चुनौती और बढ़ जाती है।
अंबिकापुर रोड पर डिवाइडर की हालत भी कम निराली नहीं है। डिवाइडर में लगे लोहे टूटकर अपनी बदहाली की कहानी खुद बयां कर रहे हैं, जबकि उस पर लगी लाइटें रोशनी देने के बजाय शो-पीस बनकर रह गई हैं। सवाल यह है कि जब सड़क और डिवाइडर की देखरेख ही नहीं हो पा रही, तो शहर की सुंदरता और यातायात व्यवस्था के दावे आखिर किस आधार पर किए जा रहे हैं?
जशपुर रोड : गड्ढों में सड़क तलाश रहे राहगीर!
जशपुर रोड पर पूरन तालाब के पास सड़क की हालत भी वाहन चालकों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। बड़े-बड़े गड्ढों को गिट्टियों से पाटकर जैसे-तैसे आवागमन लायक बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन वाहनों के गुजरते ही धूल उड़ने लगती है। राहगीरों का कहना है कि इस मार्ग से गुजरते समय सड़क पर नजर कम और गड्ढों पर नजर ज्यादा रखनी पड़ती है। विकास की सड़क पर सफर करने निकले लोग कब गड्ढों की परीक्षा देने लगते हैं, पता ही नहीं चलता।
PWD की सड़कें भी बेहाल, नंदन झरिया पुल के पास हादसों का खतरा!
राष्ट्रीय राजमार्ग के साथ लोक निर्माण विभाग की सड़कों की स्थिति भी सवालों के घेरे में है। नंदन झरिया पुल के पास सड़क पर बने बड़े-बड़े गड्ढे आवागमन को जोखिमपूर्ण बना रहे हैं। स्थानीय नागरिकों के अनुसार यहां आए दिन वाहन चालकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। पुल की स्थिति को लेकर भी लोगों में चिंता है। नागरिकों का सवाल है कि क्या जिम्मेदार विभाग किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है? आखिर सड़क और पुल की मरम्मत के लिए शुभ मुहूर्त कब निकलेगा?
धूल-मुक्त शहर का दावा हवा में, दुकानदारों के कारोबार पर धूल की परत!
पत्थलगांव के बाजार में धूल अब केवल सड़क तक सीमित नहीं है, बल्कि दुकानों और व्यापार तक पहुंच चुकी है। बड़े वाहन गुजरते ही धूल का गुबार उठता है और दुकानदारों को अपनी दुकानें बचाने के लिए बार-बार सफाई करनी पड़ती है। कपड़ा, किराना, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य दुकानों में रखे सामान पर धूल की परत जम जाती है। व्यापारियों का कहना है कि दीपावली जैसे बड़े त्योहार पर जहां ग्राहकों की आवाजाही बढ़नी चाहिए, वहीं धूल और बदहाल सड़कों के कारण बाजार आने वाले लोगों को परेशानी उठानी पड़ रही है।
बुजुर्गों और सांस संबंधी परेशानी से जूझ रहे लोगों के लिए यह स्थिति और चिंताजनक है। बच्चों, राहगीरों, ठेला संचालकों और दुकानदारों को धूल के बीच दिन गुजारना पड़ रहा है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर धूल-मुक्त शहर की योजनाएं फाइलों से निकलकर सड़कों तक कब पहुंचेंगी?
दस साल से बाईपास का इंतजार, मुआवजा बंटा लेकिन सड़क का पता नहीं!
पत्थलगांव की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि शहर को लगभग दस वर्ष पहले बाईपास सड़क की सौगात मिलने की उम्मीद जगी थी। इसके लिए शासन की ओर से करोड़ों रुपये का मुआवजा भी जमीन मालिकों को वितरित किया गया। लोगों को लगा था कि अब भारी वाहनों का दबाव शहर के भीतर से कम होगा और यातायात व्यवस्था को राहत मिलेगी।
लेकिन दस साल गुजर जाने के बाद भी बाईपास सड़क का सपना जमीन पर उतरता दिखाई नहीं दे रहा। मुआवजा वितरण के बाद भी निर्माण की दिशा में ठोस प्रगति नहीं होने से नागरिकों के मन में कई सवाल हैं। आखिर बाईपास की फाइल किस मेज पर अटकी है? करोड़ों रुपये का मुआवजा बांटने के बाद भी सड़क का निर्माण क्यों नहीं हो पाया? क्या इस योजना का उद्देश्य केवल कागजों में बाईपास बनाना था?
विडंबना यह भी है कि नागरिकों के अनुसार शहर के भीतर ही सड़क निर्माण की योजनाओं की चर्चा होती रहती है, जबकि बाईपास बनने से भारी वाहनों का दबाव शहर के बाहर ही नियंत्रित किया जा सकता है। ऐसे में लोगों का सवाल है कि जब बाईपास यातायात का दबाव कम कर सकता है, तो आखिर शहर को बार-बार खोदने और भीतर ही भीतर यातायात का बोझ बढ़ाने की नौबत क्यों आ रही है?
करोड़ों का मुआवजा, दस साल का इंतजार और जनता के हिस्से में सिर्फ धूल!
बाईपास का मामला पत्थलगांव की विकास व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ा है। जमीन मालिकों को मुआवजा मिल गया, लेकिन आम नागरिकों को अब तक बाईपास का लाभ नहीं मिला। शहर के भीतर भारी वाहनों का दबाव बना हुआ है। बाजार में जाम, सड़कों पर गड्ढे और वातावरण में धूल का गुबार लोगों की रोजमर्रा की परेशानी बन गया है।
ऐसे में व्यंग्यात्मक सवाल उठ रहा है कि क्या पत्थलगांव का बाईपास भी उन सरकारी योजनाओं की सूची में शामिल हो गया है, जिनका उद्घाटन कागजों में और इंतजार जनता के हिस्से में आता है?
जिम्मेदार विभागों से जनता के पांच सीधे सवाल
NH-43 के प्रकाश स्कूल के पास सड़क की मरम्मत आखिर कब होगी?
अंबिकापुर रोड के क्षतिग्रस्त डिवाइडर और बंद पड़ी लाइटों को कब सुधारा जाएगा?
जशपुर रोड और नंदन झरिया पुल के पास गड्ढों की स्थायी मरम्मत कब होगी?
दस साल पहले प्रस्तावित बाईपास सड़क का निर्माण आखिर कब शुरू होगा और करोड़ों रुपये के मुआवजे के बाद भी परियोजना अधूरी क्यों है?
अब जनता को आश्वासन नहीं, सड़क पर दिखाई देने वाला विकास चाहिए!
पत्थलगांव के नागरिकों की मांग है कि NH और PWD की सभी खराब सड़कों की तत्काल मरम्मत कराई जाए। गड्ढों को केवल मिट्टी और गिट्टी से भरने की खानापूर्ति के बजाय गुणवत्तापूर्ण निर्माण हो। नंदन झरिया पुल की तकनीकी जांच कराई जाए। इसके साथ ही वर्षों से लंबित बाईपास परियोजना को प्राथमिकता के साथ धरातल पर उतारा जाए।
आखिर पत्थलगांव को विकास की रोशनी कब मिलेगी? दीपावली के दीप तो हर साल जलेंगे, लेकिन यदि सड़कें इसी तरह गड्ढों में डूबी रहीं और धूल के गुबार में शहर सांस लेता रहा, तो रोशनी का त्योहार भी नागरिकों की परेशानियों को दूर नहीं कर पाएगा।
शहरवासियों की मांग साफ है—उन्हें भाषणों में स्मार्ट शहर, फाइलों में धूल-मुक्त नगर और कागजों में बाईपास नहीं चाहिए। उन्हें चलने लायक सड़क, सुरक्षित पुल, रोशनी देता डिवाइडर और धूल से राहत चाहिए। अब देखना यह है कि जिम्मेदार विभाग जनता की इस आवाज को सुनते हैं या पत्थलगांव की सड़कें अगले दीपावली तक भी गड्ढों और धूल का वही पुराना उपहार देती रहेंगी!