साढ़े तीन महीने पहले गरजे थे जॉइंट डायरेक्टर, अब आदेशों की फाइलें कर रहीं अस्पताल में आराम! निरीक्षण में मिली थीं खामियां ही खामियां, नोटिस और सुधार के निर्देश हुए जारी… लेकिन जमीनी हकीकत आज भी जस की तस

 

मुकेश अग्रवाल

पत्थलगांव।

पत्थलगांव सिविल अस्पताल की बदहाल व्यवस्थाओं को लेकर करीब साढ़े तीन महीने पहले सरगुजा स्वास्थ्य विभाग के जॉइंट डायरेक्टर अनिल शुक्ला ने आकस्मिक निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान अस्पताल की व्यवस्थाओं और खामियों को देखकर अधिकारी नाराज हुए थे। तीन दर्जन से अधिक अधिकारी-कर्मचारियों को नोटिस थमाए गए और व्यवस्थाओं को सप्ताहभर में सुधारने के सख्त निर्देश भी दिए गए।

लेकिन लगता है कि उन निर्देशों ने अस्पताल की व्यवस्था सुधारने के बजाय फाइलों में आराम करने का रास्ता चुन लिया। साढ़े तीन महीने गुजर गए, मगर अस्पताल की कई समस्याएं आज भी वहीं खड़ी हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि तब खामियां निरीक्षण में दिखाई दी थीं और अब वही खामियां रोजाना मरीजों और उनके परिजनों को दिखाई दे रही हैं।

नोटिस जारी हुआ, आदेश हुआ… कार्रवाई शायद रास्ते में है!

अस्पताल में सुरक्षा व्यवस्था का आलम यह है कि गार्ड की व्यवस्था तक 제대로 नहीं हो सकी। पत्रकारों द्वारा अस्पताल में तैनात गार्ड के शराबखोरी और ड्यूटी से नदारद रहने की शिकायत जॉइंट डायरेक्टर से की गई थी। इसके बाद तत्काल ऐसे गार्ड को हटाकर नई नियुक्ति करने के निर्देश दिए गए थे।

लेकिन साढ़े तीन महीने बाद भी नई नियुक्ति का इंतजार खत्म नहीं हुआ। जब अस्पताल प्रबंधन से सवाल किया जाता है तो जवाब आता है—फंड नहीं है।

अब सवाल यह है कि जब कथित तौर पर ड्यूटी से गायब रहने वाले गार्ड मौजूद थे, तब उनके लिए फंड कहां से आता था? और व्यवस्था सुधारने के आदेश के बाद अचानक फंड की गाड़ी किस मोड़ पर पंचर हो गई? यह सवाल नागरिकों के लिए किसी पहेली से कम नहीं है।

डॉक्टरों का ड्यूटी चार्ट भी शायद फाइलों में ही ड्यूटी कर रहा!

जॉइंट डायरेक्टर ने अस्पताल में पदस्थ डॉक्टरों की सूची, मोबाइल नंबर और ड्यूटी चार्ट सार्वजनिक स्थान पर लगाने के निर्देश दिए थे, ताकि मरीजों को यह पता चल सके कि किस समय कौन डॉक्टर उपलब्ध रहेगा।

लेकिन अस्पताल में डॉक्टरों का ड्यूटी चार्ट ढूंढना भी मरीजों के लिए किसी खजाने की खोज से कम नहीं है। वहीं अस्पताल में डॉक्टरों की कुर्सियां भी कई बार खाली नजर आती हैं।

ऐसे में मरीज इलाज कराने अस्पताल पहुंचे या डॉक्टर साहब की कुर्सी के दर्शन करने—यह फैसला मरीज खुद करे!

फिजियोथैरेपी कक्ष बना स्टोर रूम, मशीनें कर रहीं कबाड़ बनने का इंतजार

फिजियोथैरेपी की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए बनाए गए कक्ष का हाल भी अस्पताल की व्यवस्थाओं की कहानी बयां कर रहा है। पूर्व में पदस्थ फिजियोथैरेपिस्ट के जाने के बाद सुविधा बंद हो गई और कक्ष अब स्टोर रूम में तब्दील होता नजर आ रहा है।

फिजियोथैरेपी के लिए आया सामान भी उपयोग के अभाव में कबाड़ बनने की राह पर है।

सरकार ने सुविधा भेजी, कमरा बनाया, सामान भेजा… बस सुविधा देने वाला सिस्टम शायद छुट्टी पर चला गया!

लाखों के उपकरण कमरे में बंद, मरीज सुविधाओं के लिए बाहर भटकने मजबूर

अस्पताल में महंगे स्वास्थ्य उपकरण उपलब्ध होने के बावजूद उनके उपयोग को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कई उपकरण कमरों में पड़े-पड़े धूल खा रहे हैं और उपयोग के अभाव में खराब होने की स्थिति में पहुंच रहे हैं।

जनता का सवाल सीधा है—जब शासन ने करोड़ों रुपये खर्च कर उपकरण उपलब्ध कराए हैं तो उनका इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा? यदि उपकरण खराब हो गए तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?

उपकरणों की कीमत लाखों में, उपयोग शून्य—सरकारी व्यवस्था का यह गणित मरीजों की समझ से बाहर है।

आईसीयू बना ‘शो-पीस’, मॉनिटर और एसी भी सवालों के घेरे में

नागरिकों के लिए बनाए गए आईसीयू की स्थिति भी चिंता पैदा करने वाली बताई जा रही है। आरोप है कि आईसीयू में लगे कुछ जरूरी उपकरण और मॉनिटर नियमित रूप से काम नहीं करते, जबकि एसी की व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है।

चर्चा तो यह भी है कि आकस्मिक निरीक्षण के समय आईसीयू में नर्सों की तैनाती कर व्यवस्था पूरी दिखाने की कोशिश होती है।

यदि यह आरोप सही है तो यह केवल व्यवस्था की कमी नहीं, बल्कि निरीक्षण और वास्तविक स्थिति के बीच की दूरी का गंभीर उदाहरण है।

2016 से बंद ब्लड सुविधा, मरीजों के हिस्से में अब भी इंतजार

पत्थलगांव जैसे बड़े आदिवासी अंचल के अस्पताल में ब्लड बैंक अथवा ब्लड उपलब्धता की सुविधा का अभाव वर्षों से मरीजों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है।

बताया जाता है कि वर्ष 2011 में यहां ब्लड निकालने की सुविधा उपलब्ध थी, लेकिन 2016 में इसे बंद कर दिया गया। इसके बाद इतने वर्षों में भी सुविधा बहाल नहीं हो सकी।

गंभीर मरीजों और उनके परिजनों को जरूरत के समय निजी संस्थानों पर निर्भर होना पड़ता है, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता है।

सरकारी अस्पताल में इलाज की उम्मीद लेकर आने वाला मरीज जब खून के लिए निजी व्यवस्था तलाशता है, तो सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सफाई व्यवस्था: निरीक्षण की खबर आए तो चमकता अस्पताल, बाकी दिन भगवान भरोसे!

सिविल अस्पताल की सफाई व्यवस्था को लेकर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं। बाथरूम और आसपास की गंदगी तथा दुर्गंध मरीजों और परिजनों के लिए परेशानी का कारण बनती है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि जब किसी बड़े अधिकारी के निरीक्षण की सूचना मिलती है, तब अस्पताल की सफाई अचानक युद्धस्तर पर शुरू हो जाती है।

यानी अस्पताल में सफाई व्यवस्था का भी अपना टाइम टेबल है—

अधिकारी आएं तो सफाई, अधिकारी जाएं तो फिर वही कहानी!

विशेषज्ञ डॉक्टर गायब, ऑपरेशन थिएटर तैयार—लेकिन ऑपरेशन कौन करेगा?

सिविल अस्पताल में एमडी मेडिसिन, हड्डी रोग, शिशु रोग और एनेस्थीसिया जैसे विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी बताई जा रही है।

शासन ने लाखों रुपये खर्च कर ऑपरेशन थिएटर तैयार किया है, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण इसका पूरा लाभ मरीजों को नहीं मिल पा रहा है।

ऑपरेशन थिएटर तैयार है, मशीनें तैयार हैं, मरीज तैयार हैं… बस डॉक्टरों का इंतजार है!

‘हमर लैब’ की मशीनें आईं, जांच की सुविधा अब भी सवालों में

सरकार की महत्वाकांक्षी ‘हमर लैब’ योजना के तहत अस्पताल में महंगी मशीनें उपलब्ध कराई गई हैं, लेकिन इन मशीनों से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र के मरीजों को नियमित जांच की सुविधा नहीं मिल पाने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

करोड़ों की मशीनें अस्पताल में पहुंच गईं, लेकिन उनका लाभ मरीजों तक नहीं पहुंचा तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर मशीनें मरीजों की जांच के लिए आई हैं या कमरे की शोभा बढ़ाने के लिए?

मरीजों का खाना भी सवालों के घेरे में, मेन्यू बोर्ड गायब और गुणवत्ता बेहाल!

मरीजों को दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता को लेकर भी शिकायतें हैं। आरोप है कि टेंडर में निर्धारित मेन्यू के अनुसार नियमित रूप से भोजन उपलब्ध नहीं कराया जाता।

जब शासन मरीजों के भोजन के लिए राशि खर्च करता है तो भोजन की गुणवत्ता और मेन्यू के पालन की जिम्मेदारी तय होना भी जरूरी है।

मरीज पहले ही बीमारी से परेशान है, ऊपर से भोजन भी भरोसे लायक न मिले तो सरकारी अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल उठना तय है।

निरीक्षण का असली मतलब क्या—फोटो, नोटिस या सुधार?

साढ़े तीन महीने पहले हुए आकस्मिक निरीक्षण में यदि इतनी खामियां मिली थीं और तीन दर्जन से अधिक कर्मचारियों को नोटिस जारी हुए थे, तो अब सवाल यह है कि उन नोटिसों का क्या हुआ?

क्या जवाब मिल गए?

क्या कार्रवाई हुई?

क्या व्यवस्थाएं सुधरीं?

क्या जिम्मेदारी तय हुई?

या फिर नोटिस और आदेश भी सरकारी फाइलों के उसी ‘कागजी पुलिंदे’ में शामिल हो गए, जहां सुधार की उम्मीदें वर्षों से धूल खा रही हैं?

पत्थलगांव का सिविल अस्पताल आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्र की बड़ी आबादी के लिए स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण केंद्र है। ऐसे में यहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, सफाई व्यवस्था, ब्लड सुविधा, फिजियोथैरेपी, उपकरणों के उपयोग, आईसीयू और मरीजों के भोजन जैसी समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देना जरूरी है।

जनता का सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि निरीक्षण कब होगा, बल्कि यह है कि पिछले निरीक्षण के आदेशों का पालन कब होगा?

क्योंकि जनता को नोटिस नहीं, इलाज चाहिए। आदेश नहीं, व्यवस्था चाहिए। निरीक्षण नहीं, सुधार चाहिए।

अब देखना यह है कि पत्थलगांव सिविल अस्पताल की बदहाल व्यवस्थाओं को आखिर कब उपचार मिलेगा—या फिर अगला निरीक्षण आने तक पुरानी फाइलों पर नई तारीख चढ़ाकर सरकारी व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी पूरी मानती रहेगी।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button