13 लोगों का स्टाफ, लाखों का वेतन और करोड़ों की मशीनें… फिर भी जांच के लिए जिला क्यों?आरोग्य लैब में करोड़ों की मशीनें बनीं शोपीस, मरीजों के सैंपल घूम रहे जिले की राह!

80 लाख की मशीन धूल फांक रही, सैंपल जिले की दौड़ लगा रहे! पत्थलगांव अस्पताल का ‘अजब सिस्टम’

 

मुकेश अग्रवाल

पत्थलगांव। आदिवासी अंचल में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के बड़े-बड़े दावों के बीच पत्थलगांव सिविल अस्पताल की तस्वीर सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करती नजर आ रही है। यहां मरीजों की जांच जल्द कराने के लिए स्थापित आरोग्य लैब में महंगी मशीनें तो मौजूद हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल नहीं हो रहा। नतीजा यह कि मरीजों के सैंपल स्थानीय स्तर पर जांच होने के बजाय जिले भेजे जा रहे हैं और रिपोर्ट के इंतजार में मरीजों की परेशानी बढ़ती जा रही है।

सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं को आधुनिक बनाने और मरीजों को समय पर जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आरोग्य लैब जैसी व्यवस्था शुरू की। मगर पत्थलगांव में हालात देखकर ऐसा लगता है कि योजना तो दौड़ रही है, लेकिन मशीनें अभी भी ‘आराम मोड’ में हैं।

80 लाख की मशीन, लेकिन काम सिर्फ कमरे की शोभा बढ़ाने का!

आरोग्य लैब में लगी बायोकेमिस्ट्री एनालाइजर मशीन की कीमत करीब 80 लाख रुपये बताई जा रही है। मशीन का उद्देश्य मरीजों के खून से संबंधित विभिन्न जांचों को स्थानीय स्तर पर करना है। लेकिन कर्मचारियों के अनुसार मशीन शुरू हो जाए तो कई जांचों की रिपोर्ट यहीं तैयार की जा सकती है।

इसके बावजूद मशीन चालू क्यों नहीं की जा रही, यह बड़ा सवाल बना हुआ है। जब लाखों रुपये खर्च कर मशीन खरीदी गई, लैब तैयार की गई और स्टाफ की व्यवस्था की गई, तो फिर मशीन को चालू करने की ‘मुहूर्त की घड़ी’ आखिर कब आएगी?

मरीज चार दिन इंतजार करे, मशीन कमरे में आराम करे!

हाल ही में खरकटा निवासी अनीता तिग्गा, जो डायलिसिस की मरीज हैं, के सैंपल की जांच रिपोर्ट चार दिन बाद भी नहीं मिल पाने का मामला सामने आया था। इस मामले को लेकर समाचार पत्रों में भी खबर प्रकाशित हुई थी।

सवाल यह है कि जब पत्थलगांव में ही जांच के लिए अत्याधुनिक मशीन उपलब्ध है, तो सैंपल को जिले भेजने की जरूरत क्यों पड़ रही है? मशीन लाखों की, लैब सरकारी, स्टाफ मौजूद और फिर भी रिपोर्ट के लिए मरीज परेशान—आखिर यह व्यवस्था किसके लिए है?

13 लोगों का स्टाफ, फिर भी जांच व्यवस्था ‘वेटिंग में’

आरोग्य लैब की व्यवस्था पर एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आ रहा है। बताया जा रहा है कि सिविल अस्पताल की जांच व्यवस्था में पहले से करीब 9 शासकीय कर्मचारी मौजूद हैं। इसके अलावा हॉल में करीब 4 कर्मचारी तथा आरोग्य लैब के लिए एचएलएल की ओर से स्टाफ उपलब्ध कराया गया है।

यानी कुल मिलाकर करीब 13 लोगों का स्टाफ जांच व्यवस्था से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। सरकार इन कर्मचारियों के वेतन पर हर महीने लाखों रुपये खर्च कर रही है। इसके बावजूद मरीजों को समय पर जांच रिपोर्ट नहीं मिलना व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।

करोड़ों की मशीनें कबाड़ बनेंगी या मरीजों के काम आएंगी?

बताया जा रहा है कि सिविल अस्पताल में पहले से ही करीब ढाई करोड़ रुपये की जांच मशीनें उपलब्ध हैं। अब आरोग्य लैब में भी महंगी मशीनें स्थापित हैं। लेकिन यदि इनका नियमित उपयोग ही नहीं होगा तो करोड़ों रुपये की सरकारी संपत्ति का क्या फायदा?

सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन यदि मशीनें कमरे में बंद रहकर केवल धूल और दीवारों की शोभा बढ़ाती रहेंगी तो आने वाले समय में इनकी हालत ‘नई मशीन से कबाड़ मशीन’ होने में देर नहीं लगेगी।

अधिकारी कागजों पर दौड़ा रहे घोड़े, मरीज रिपोर्ट के पीछे दौड़ रहे

सबसे बड़ा सवाल स्थानीय स्वास्थ्य प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहा है। यदि आरोग्य लैब में मशीन उपलब्ध है और उसे चालू करने से स्थानीय स्तर पर जांच संभव है, तो फिर उसे शुरू क्यों नहीं किया जा रहा?

क्या मशीन चालू करने के लिए किसी आदेश का इंतजार है, या फिर फाइलों में ही मशीनों को दौड़ाया जा रहा है?

स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से यह सवाल भी पूछा जाना जरूरी है कि जब सरकार ने सुविधा उपलब्ध करा दी, मशीन लगा दी और स्टाफ भी दे दिया, तो मरीजों को उसका लाभ आखिर क्यों नहीं मिल रहा?

अब जनता पूछ रही—मशीनें कब चलेंगी?

पत्थलगांव के लोगों का सीधा सवाल है कि सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई करोड़ों रुपये की मशीनों का उपयोग आखिर कब शुरू होगा? क्या मरीजों को जांच रिपोर्ट के लिए जिले की ओर भेजे गए सैंपल का इंतजार ही करना पड़ेगा या स्थानीय स्तर पर ही जांच सुविधा शुरू होगी?

सरकारी खजाने से करोड़ों खर्च हुए, मशीनें अस्पताल पहुंचीं, लैब भी बन गई और स्टाफ भी बैठ गया… अब बस मशीनों के चलने का इंतजार है।

अब देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारी आरोग्य लैब की महंगी मशीनों को ‘शोपीस’ से ‘सर्विस’ में कब लाते हैं, या फिर सरकारी योजनाओं की तरह ये मशीनें भी फाइलों में ही पूरी तरह सक्रिय दिखाई देती रहेंगी।

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