बिना संगीत-वाद्य यंत्र के 3 घंटे तक मंत्रमुग्ध रहे पवन कुमार त्रिपाठी महाराज के श्रीमुख से शिव महिमा का रसपान, तृतीय दिवस कथा में उमड़ी भक्तों की भीड़ श्रद्धालु, शिव महापुराण कथा में गूंजा माता सती और दक्ष यज्ञ का मार्मिक प्रसंग”



मुकेश अग्रवाल
पत्थलगांव। अग्रवाल महिला मंडल, पत्थलगांव के तत्वावधान में श्याम मंदिर परिसर में आयोजित सात दिवसीय श्री शिव महापुराण कथा के तृतीय दिवस श्रद्धालु भक्ति एवं भावनाओं के सागर में डूबे नजर आए। कथा व्यास पंडित पवन कुमार त्रिपाठी महाराज (प्रयागराज) ने माता सती और दक्ष यज्ञ के प्रसंग का अत्यंत मार्मिक एवं भावपूर्ण वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को शिव भक्ति का संदेश दिया।
विशेष बात यह रही कि बिना किसी संगीत वाद्य यंत्र एवं बिना किसी नृत्य-गान के पंडित पवन कुमार त्रिपाठी महाराज ने अपने ओजस्वी एवं मधुर प्रवचन से लगभग तीन घंटे तक श्रोताओं को भक्ति रस में बांधे रखा। कथा के दौरान श्याम मंदिर परिसर “हर-हर महादेव” और “बोल बम” के जयघोष से गूंज उठा। बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

माता सती एवं दक्ष यज्ञ प्रसंग का विस्तृत वर्णन
कथा के दौरान महाराज श्री ने बताया कि प्रजापति दक्ष भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र थे। उन्हें अपने पद और प्रतिष्ठा का अत्यधिक अहंकार हो गया था। एक बार सभा में भगवान शिव के प्रति सम्मान प्रकट न करने को लेकर दक्ष के मन में शिवजी के प्रति वैरभाव उत्पन्न हो गया। उन्होंने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया और जानबूझकर भगवान शिव तथा उनकी पत्नी माता सती को आमंत्रित नहीं किया।
जब माता सती को यज्ञ के आयोजन की जानकारी मिली तो उन्होंने भगवान शिव से यज्ञ में जाने की इच्छा व्यक्त की। भगवान शिव ने बिना निमंत्रण किसी समारोह में जाने को उचित नहीं बताया, लेकिन पिता के घर जाने की भावना से प्रेरित होकर माता सती यज्ञ स्थल पहुंच गईं।
यज्ञ स्थल पर पहुंचने के बाद माता सती ने देखा कि सभी देवी-देवताओं का सम्मान किया जा रहा है, लेकिन भगवान शिव का कहीं भी आदर नहीं है। प्रजापति दक्ष ने भगवान शिव के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। अपने आराध्य पति का अपमान सहन न कर पाने वाली माता सती अत्यंत दुखी हो गईं। उन्होंने कहा कि जिस शरीर ने ऐसे पिता से जन्म लिया है जो भगवान शिव का अपमान करता है, उस शरीर को धारण करना व्यर्थ है।
इसके बाद माता सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दिया। माता सती के आत्मदाह की सूचना मिलने पर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने अपनी जटा से वीरभद्र और भद्रकाली को प्रकट किया, जिन्होंने यज्ञ का विध्वंस कर दिया और दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया।
बाद में देवताओं एवं ऋषियों के अनुरोध पर भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ। उन्होंने दक्ष को क्षमा करते हुए बकरे का सिर लगाकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। इस प्रसंग के माध्यम से महाराज श्री ने बताया कि अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बनता है, जबकि विनम्रता, श्रद्धा और भक्ति जीवन को सफल बनाती है।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव करुणा और क्षमा के सागर हैं तथा सच्चे मन से उनकी आराधना करने वाले भक्तों पर सदैव कृपा बरसती है।
कथा के अंत में आरती एवं प्रसाद वितरण किया गया।

श्याम सेवा समिति के अध्यक्ष सुशीलबलाजी, अनिल मित्तल, महेंद्र अग्रवाल, नरेश गोयल एवं अन्य समिति के लोगों द्वारा कथा समाप्ति पर ठंडा एवं जल का वितरण किया जा रहा है
आयोजन समिति एवं अग्रवाल महिला मंडल ने श्रद्धालुओं से आगामी दिनों में भी कथा श्रवण कर पुण्य लाभ प्राप्त करने की अपील की है। यह सात दिवसीय शिव महापुराण कथा आगामी दिनों तक प्रतिदिन आयोजित होगी, जिसमें भगवान शिव की विभिन्न दिव्य लीलाओं एवं प्रसंगों का वर्णन किया जाएगा। श्रद्धालुओं की उपस्थिति लगातार बढ़ रही है और प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में भक्त कथा का रसपान कर रहे हैं।