किलकिलेश्वर धाम में धूमधाम से मनी महर्षि कश्यप जयंती, रौनियार समाज ने दिखाई एकजुटता और उत्साह

पूजन-अर्चना, खेलकूद प्रतियोगिताएं और सम्मान समारोह के साथ पूरे दिन चला भव्य आयोजन

मुकेश अग्रवाल

पत्थलगांव के पावन किलकिला धाम स्थित भगवान भोलेनाथ किलकिलेश्वर मंदिर में रौनियार समाज द्वारा महर्षि कश्यप जयंती बड़े ही हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाई गई। कार्यक्रम की शुरुआत सुबह 9 बजे विधिवत पूजन-अर्चना से हुई, जिसमें महर्षि कश्यप के चित्र पर माल्यार्पण कर आरती एवं पूजा संपन्न की गई।

इसके पश्चात समाज के प्रमुख सदस्यों—मुखिया अरुण गुप्ता, संरक्षक शिव शंकर गुप्ता, मदन गुप्ता एवं विजय गुप्ता—ने मंदिर में विराजमान कपिल मुनि का सम्मान कर कार्यक्रम की जानकारी दी।

🟠 दिनभर चला उत्सव का माहौल

सुबह से ही रौनियार समाज के परिवारजन बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सभी के लिए जलपान की व्यवस्था की गई। इसके बाद बच्चों, महिलाओं एवं पुरुषों के लिए विभिन्न खेलकूद प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया, जिसमें सभी ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

कुर्सी दौड़, टेबल पर रखे गिलास को टेनिस बॉल से गिराने, हाथ बांधकर चॉकलेट खाने जैसे मनोरंजक खेलों में प्रतिभागियों ने जमकर आनंद उठाया। विजेताओं को प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया।

🟣 सम्मान और सामाजिक एकता का संदेश

करीब 11 बजे समाज के सदस्यों को गमछा पहनाकर तथा महिलाओं को स्टॉल भेंट कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर समाज के लोगों में विशेष उत्साह और खुशी देखने को मिली।

कार्यक्रम के दौरान “मैं रौनियार हूं, रौनियार कहलाता हूं” जैसे गीतों से पूरा मंदिर परिसर गुंजायमान रहा, वहीं बच्चे, महिलाएं और पुरुष तालियों के साथ प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन करते नजर आए।

🔴 युवा वर्ग की रही अहम भूमिका

शाम 4 बजे कार्यक्रम का समापन हुआ। इस आयोजन को सफल बनाने में रौनियार समाज के युवा वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कम समय में की गई तैयारी के बावजूद कार्यक्रम बेहद सफल और व्यवस्थित रहा, जो समाज के लिए गर्व का विषय बना।

🟤 आकर्षण का केंद्र बना बस स्टैंड चौक

महर्षि कश्यप जयंती के अवसर पर पत्थलगांव बस स्टैंड चौक को महर्षि कश्यप एवं भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य के चित्रों से सजाया गया, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा।

⚫ समापन

पूरे आयोजन में समाज के हर वर्ग ने मिलकर एकजुटता का परिचय दिया। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि सामाजिक समरसता और भाईचारे का भी सशक्त संदेश दे

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