ढाई महीने पहले गरजे थे साहब, अब फाइलों में सो रही है व्यवस्था! ज्वाइंट डायरेक्टर के नोटिस और सुधार के आदेश बने कागजी शोपीस, सिविल अस्पताल की बदहाली जस की तस

मुकेश अग्रवाल

पत्थलगांव।

ढाई महीने पहले सरगुजा स्वास्थ्य विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर अनिल शुक्ला ने पत्थलगांव सिविल अस्पताल का आकस्मिक निरीक्षण किया था। निरीक्षण में अस्पताल की व्यवस्थाओं में कई खामियां सामने आई थीं। हालात देखकर अधिकारी नाराज हुए और तीन दर्जन से अधिक अधिकारी-कर्मचारियों को नोटिस जारी करते हुए व्यवस्थाओं में सुधार के कड़े निर्देश दिए गए थे।

लेकिन लगता है कि साहब का निरीक्षण तो आकस्मिक था, मगर सुधार की उम्मीद स्थायी रूप से गायब हो गई!

ढाई महीने बीत गए, लेकिन अस्पताल की व्यवस्थाओं को देखकर ऐसा लगता है जैसे सुधार के आदेश अस्पताल की दीवारों से टकराकर सीधे सरकारी फाइलों में दफन हो गए हों। नोटिस जारी हुए, आदेश निकले और कागजों का वजन बढ़ गया, लेकिन अस्पताल की हालत में कितना वजन आया—यह मरीज और उनके परिजन रोज भुगत रहे हैं।

गार्ड हटाने का आदेश हुआ, नया गार्ड आज तक ‘रास्ते में’!

पत्रकारों द्वारा अस्पताल में तैनात गार्ड के ड्यूटी से नदारद रहने और शराबखोरी संबंधी शिकायत ज्वाइंट डायरेक्टर के समक्ष रखी गई थी। इसके बाद संबंधित गार्ड को हटाने और नई नियुक्ति करने के निर्देश दिए गए थे।

अब सवाल यह है कि ढाई महीने में नया गार्ड अस्पताल तक पहुंच क्यों नहीं पाया?

बीएमओ की ओर से फंड की कमी का हवाला दिया जाता है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब पुराना गार्ड तैनात था, तब व्यवस्था का खर्च किस फंड से चल रहा था?

गार्ड की ड्यूटी में फंड था, लेकिन गार्ड बदलने में फंड गायब हो गया—यह गणित आखिर कौन समझाएगा?

डॉक्टरों का ड्यूटी चार्ट भी ‘लापता’

निरीक्षण के दौरान ज्वाइंट डायरेक्टर ने अस्पताल में डॉक्टरों का ड्यूटी चार्ट, पदस्थ डॉक्टरों के मोबाइल नंबर और उनकी सूची सार्वजनिक रूप से लगाने के निर्देश दिए थे। मगर अस्पताल में आज भी ड्यूटी चार्ट ढूंढना किसी मरीज की बीमारी से ज्यादा कठिन नजर आता है।

अस्पताल में डॉक्टरों की कुर्सियां भी कई बार खाली दिखाई देने की शिकायतें सामने आती हैं। ऐसे में मरीज आखिर किस डॉक्टर को खोजे और किससे इलाज की उम्मीद करे—यह अपने आप में बड़ा सवाल है।

आदेश पर आदेश… मगर अमल का पता नहीं!

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ढाई महीने बाद भी यदि निरीक्षण के दौरान मिली खामियां दूर नहीं हुईं तो फिर उस निरीक्षण, नोटिस और निर्देशों का उद्देश्य क्या था?

क्या सरकारी अस्पतालों में निरीक्षण सिर्फ फोटो, नोटिस और कागजी कार्रवाई तक सीमित रह गया है?

स्थानीय लोगों का आरोप है कि अस्पताल की बदहाल व्यवस्थाओं का खामियाजा मरीजों और ग्रामीणों को भुगतना पड़ रहा है। कुछ मरीजों को रेफर किए जाने और निजी अस्पतालों की ओर जाने को मजबूर होने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। हालांकि निजी अस्पतालों की ओर रेफर किए जाने के पीछे कमीशन संबंधी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इस संबंध में संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना बाकी है।

सवाल बड़ा है—कागज सुधरे या अस्पताल?

पत्थलगांव सिविल अस्पताल में यदि ढाई महीने पहले मिली खामियां आज भी बरकरार हैं, तो यह केवल एक अस्पताल की समस्या नहीं बल्कि निरीक्षण और कार्रवाई की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।

जनता जानना चाहती है—

नोटिस का क्या हुआ?

आदेश पर कितना अमल हुआ?

गार्ड की नई नियुक्ति कब होगी?

डॉक्टरों का ड्यूटी चार्ट कब लगेगा?

और सबसे बड़ा सवाल—

आखिर पत्थलगांव सिविल अस्पताल की बदहाली का इलाज कब शुरू होगा?

कहीं ऐसा तो नहीं कि यहां मरीजों का इलाज बाद में और फाइलों का इलाज पहले होता है।

 

 

 

क्या बदहाल सिविल अस्पताल पत्थलगांव की सुध लेने वाला कोई नही बड़ी बिल्डिंग क्या बस देखने के लिए मरीजो को शासन से मिलने वाली सुविधाओं का पता नही मरीजो को नास्ते और खाने की गुणवत्ता कुछ नही वादे बड़े हकीकत में कुछ भी नही।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button